Tuesday, 16 April 2013

आदमी


आदमी ही आदमी का दुश्मन है,
कोई दलित, कोई सवर्ण तो कोई मुस्लिम है..

जिस तरह सुबह, दोपहर, शाम सब एक प्रहर है,
असहिष्णुता की बात करना, दूध में मिला जहर है..

कलयुग में सत्य अहिंसा की बात करना, भयंकर है,
ऐशे में नृप और राक्षस में क्या अंतर है..

गंगोत्री में क्या गंगा-जमुना-सरस्वती, सब हर हर गंगे है,
धर्म जाती की बात करने वाले सम्मान के लिए भूखे नंगे है..

सबसे ज्यादा विवाद में रहता यहाँ का गणतंत्र है,
नहले पर दहला मारता, यहाँ का कानून तन्त्र है..

दारू-मुर्गा, जात-पात पर ही जिन्दा यहाँ का लोकतंत्र है,
क्योंकी यह नेताओं का नही जनता का ही षडयंत्र है..

युवा,पत्रकार,वकील,अधिकारी,पुलिस सभी अपने फेरे में है,
तभी तो इतना उर्जावान देश अब भी अँधेरे में है..

यह उतनी ही झूठी नजीर है की देश में समता के लिए शिक्षा जरूरी है.
जितना यह कहना की मोहब्बत पर लिखने के लिए ये होना जरूरी है..
--"राघवेन्द्र मिश्र"

Friday, 29 March 2013

परिस्थिति...


परिस्थिति जब खराब होती है,
परछाई भी ना साथ होती है,
अपना भी पराया कैसे होता है,
की वक्त ए-मुश्किलात में ,
ये व्यक्ति जान उठता है|


सूखे में जो खेती कर जाये,
दम है उस मेहनत की भुजाओं में,
तपीष में जब बच जाये हरी पत्ती,
सदैव पूजा जाता है वह वृक्षों में,
चुनौती के आखिरी दम पर,
कौन अपना-पराया है,
ये व्यक्ति जान उठता है|


खड़ी है भीड़ जिसके साथ कंधे मिलाकर,
खाषम -खाष हो जाता है,दुश्मन भी इशारों पर,
सच्चा है जो अपने उसूलों की राहों पर,
ईश्वर भी सोचता होगा की,
जीवित है मानवता अब भी इस धरातल पर|


                                               ||राघवेन्द्र मिश्र||

Saturday, 17 November 2012

सही चीज को पहचानो..

उम्र के हर वर्ष में,
माँ-बाप से मिले ममत्व में,
जीवन में बुने सपनों में
पल-पल बदलते इन रिश्तों में
सही चीज को पहचानो..

वर्ष के हर ऋतुओं में
हर वक्त बदलते इन मौषम में,
पतझड़ में झड़ी पत्तियों में
दूर प्रवास को आये पंछियों में
सही चीज को पहचानो..

आशाओं के हर शब्दों में,
अपने पाक-साफ इरादों में,
जीने की हर शैलियों में,
विभिन्न आयाम में बंटे इस समाज में,
सही चीज को पहचानो .....