Thursday, 20 August 2015

अमीर-गरीब सभी के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ें, 'भगवानों' के खिलाफ मार्च निकाले लोग

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। इसमें कहा गया है कि यूपी के सभी जनप्रतिनिधियों, सरकारी अफसरों, एंप्लॉइज और जजों को अपने बच्चों को सरकारी प्राइमरी स्कूलों में पढ़ाना होगा। है न शानदार फैसला!

जनप्रतिनिधी, सरकारी अफसर, एंप्लॉइज और जज यही मिलकर देश चलाते हैं। ये ही पृथ्वी के भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश और विश्वकर्मा हैं। यही आम लोगों का मुकद्दर लिखते हैं और वह भी पैसे (तनख्वाह) लेकर। वहीं, आम आदमियों की आदत होती है अफसर और बड़े लोगों के पीछे चलने की। उनके गुणगान गाने की। लेकिन, क्या ये भगवान उनके बारे में सोचते हैं। अगर हां तो हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक, पढ़ाएं अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में। अगर नहीं पढ़ा सकते तो आम लोगों को अपनी आदत बदलते हुए इन भगवानों के खिलाफ कैंडिल मार्च निकालना चाहिए। वैसे ही जैसे आए दिन कहीं न कहीं निकालते हैं। उन्हें मजबूर करना चाहिए कि वे अपने बच्चों को सरकारी-प्राथमिक स्कूल में पढ़ाएं। जिससे वह सरकारी-प्राथमिक स्कूल की व्यवस्था को ठीक करने में जरूरी कदम उठाएं। उस सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाने की जिसके द्वारा इस मामले में याचिका दायर करने वाले शिक्षक शिव कुमार पाठक को बर्खास्त कर दिया गया है। 

सरकारी स्कूलों का हाल किसी से छुपा नहीं है। वहां कक्षा (क्लास) 5 के कई बच्चों के अपने स्कूल का पूरा नाम और 100 तक की गिनती तक नहीं आती। वह बच्चे जब किसी तरह क्लास 8-9 तक पहुंचते हैं और तो उनका सामना होता है 10वीं के बोर्ड एग्जाम से। फिर वहां उनकी मुलाकात होती है नकल माफियाओं से और वह किसी तरह से 12वीं तक की पढ़ाई पूरी कर लेते हैं। इसके बाद जैसे ही पोस्ट ग्रेजुएशन या किसी कंपीटिटिव एग्जाम के लिए वह एप्लाई करते हैं तो उनका सामना होता है प्राइवेट स्कूल और सीबीएसई-आईसीएसई बोर्ड के बच्चों से। यहीं से उन्हें उनकी हैसियत समझ में आ जाती है और बढ़ती है बेरोजगारी।

इसमें बच्चों की क्या गलती है। वह तो बेचारे कच्ची मिट्टी के लोथे होते हैं। उन्हें जो जैसा पढ़ाएगा और जिस ढांचे में ढ़ालेगा वह उसी तरह ढ़लेंगे। पढ़ाई का वैज्ञानिक तरीका क्या उन्हें तो प्राथमिक तरीके से भी नहीं पढ़ाया जाता है। न तो अच्छे टीचर मिलते हैं और न ही व्यवस्था। एक-दो टीचरों से पूरा स्कूल चलता है और उनमें भी अधिकतर जुगाड़ से नौकरी पाए हुए रहते हैं। ऐसे में बच्चे क्या कर पाएंगे। सभी तो एकलव्य नहीं होते।

अब सरकारी स्कूलों के टीचर की बात करते हैं। स्कूल में पढ़ाने से ज्यादा उनकी ड्यूटी चुनावों में, सरकारी अभियानों में, मिड डे मिल का खाना बनवाने में और स्कूल की बिल्डिंग-टॉयलेट जैसी व्यवस्थाओं को देखने में ही बीत जाती है। बचे टाइम में वे क्लास लेते हैं। इसमें भी कहीं-कहीं तो एक साथ एक ही रूम में कई क्लास के बच्चों को पढ़ाया जाता है। ऐसे में वह कितना ज्ञान दे देंगे।

अब आते हैं बच्चों के अभिभावक पर। मौजूदा समय में वे ही अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाते हैं, जो गरीबी की मार झेल रहे हैं और प्राइवेट स्कूल का बोझ नहीं उठा सकते। चूंकि प्राइवेट स्कूलों की फीस के साथ-साथ अतिरिक्त खर्चे इतने होते हैं जितने में उनका पूरा परिवार एक महीना तक भोजन कर ले। इसलिए वह भोजन को ही प्राथमिकता पर रखते हैं और बच्चों को सरकारी-प्राथमिक स्कूलों में ही पढ़ाते हैं।

जनप्रतिनिधी, सरकारी अफसर, एंप्लॉइज और जज (पृथ्वी के भगवान) यही मिलकर देश चलाते हैं। ये अपने बच्चों को देश-विदेश के बड़े संस्थानों में पढ़ाते हैं। उनकी बेहतरी के लिए कुछ भी करते हैं। अब इन्हीं के बच्चे सरकारी-प्राथमिक स्कूलों में पढ़ेंगे तो वे वहां की व्यवस्थाएं सुधारने के लिए भी हर मुकम्मल व्यवस्था करेंगे। ठीक उसी तरह जैसे वह अपने बच्चों के लिए पूरा सिस्टम इधर से उधर कर देते हैं। 

हाईकोर्ट के मुताबिक, यदि सरकारी कर्मचारियों ने अपने बच्‍चों को कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ाया तो उन्‍हें फीस के बराबर की रकम हर महीने सरकारी खजाने में जमा करानी होगी। कोर्ट ने यह भी कहा था कि ऐसे लोगों का इन्क्रीमेंट और प्रमोशन कुछ वक्त के लिए रोकने के इंतजाम किए जाएं। हाईकोर्ट की सिंगल बेंच के जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने यह आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने यूपी के मुख्य सचिव को आदेश दिया था कि वे बाकी अफसरों से राय-मशविरा करके 6 महीने में नई व्यवस्था कराएं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव से कहा है कि वे इस मामले में छह महीने बाद रिपोर्ट भी दें।

अब देखिए सिस्टम की कारस्तानी। पीआईएल दाखिल करने वाले सुल्तानपुर के प्राथमिक स्कूल में टीचर शिव कुमार पाठक को डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन अफसर ने बर्खास्त कर दिया। उन पर आरोप है कि वे स्कूल से लगातार छुट्टी ले रहे थे। जबकि, शिव कुमार पाठक ने कहा कि उन पर गलत आरोप लगाया गया है। उन्होंने कहा कि जब भी कोर्ट में पैरवी का दिन आया, तो वे स्कूल से बाकायदा लिखित में छुट्टी लेकर गए हैं। प्रिंसिपल ने उन्हें छुट्टी दी है। उन्होंने कहा, "मैं सरकार के खिलाफ कई मामलों में अपोजिट पार्टी हूं, इसलिए मुझ पर कार्रवाई की जा रही है। महीनों कई टीचर नहीं आते, लेकिन उन्हें कभी बर्खास्त नहीं किया गया। मैं इसके खिलाफ अपील करूंगा।"




फोटो छत्तीसगढ़ के एक स्कूल की है, जहां टीचर शराब के नशे में 'अ' से आम और 'द' से दारू पियो सिखा रहा था।

Sunday, 16 August 2015

PM का UAE दौरा और वहां रह रहे 26 लाख भारतीय

नरेंद्र मोदी जब से प्रधानमंत्री बने हैं, लगातार दूसरे देशों का दौरा कर रहे हैं। इस दौरान वह व्यापारिक समझौते के साथ-साथ देश की सुरक्षा के लिए भी समझौते कर रहे हैं। 69वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से झंडा फहराने के बाद 16 अगस्त को वह यूएई जा रहे हैं। यूएई अबु धाबी, अजमान, दुबई, फुजेराह, रास एल-खैमाह, शारजाह और उम एल-कुवैन जैसे समृद्ध राष्ट्रों का एक संघ है और भारत से उसके अच्छे संबंध रहे हैं।

यूएई भारत के लिए अहम देश है, क्योंकि वहां भारत के लगभग 26 लाख लोग काम करते हैं, जिनमें अधिकतर मजदूर हैं। वे अमरीका और यूरोप में रहने वाले प्रवासी भारतीयों से बहुत अलग हैं। इनमें केरल के लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है। वे साल में एक बार अपने घर जरूर आते हैं और भारत में हर साल तकरीबन 12 अरब डॉलर रुपए भेजते हैं, जो कि एक बड़ी रकम है। व्यापारिक दृष्टिकोण से देखें तो चीन और अमरीका के बाद यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार देश है।

इतना महत्वपूर्ण देश होने के बावजूद बीते 34 साल से किसी प्रधानमंत्री ने वहां का दौरा नहीं किया था। नरेंद्र मोदी से पहले साल 1981 में इंदिरा गांधी वहां गई थी और साल 2013 में मनमोहन सिंह का प्रोग्राम बनते-बनते स्थगित हो गया था। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे से नई संभावनाएं बन रही है। रवानगी से पहले उन्होंने कहा भी कि वे दोनों देशों के बीच असंतुलन को खत्म कर रिश्ते सुधारना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि यह उस देश का उनका पहला दौरा है, जिसकी वे तारीफ करते हैं। हालांकि, इसके दूसरे अर्थ भी निकाले जा सकते हैं कि अब तक अमेरिका, चीन जैसे जिन 20 से ज्यादा देशों का उन्होंने दौरा किया है, वह उनकी तारीफ नहीं करना चाहते थे।   

फोटो: मेरे मित्र नवीन गडवानी की है, जो बीते चार वर्षों से दुबई में जॉब कर रहे हैं।
चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग की भारत यात्रा और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच 52 अरब डॉलर के करार हुए हैं। वहीं, अमेरिका ने भी बीते आठ महीने में दो बार भारत के साथ करार में 45 अरब डॉलर का निवेश किया है। जापान से 35 अरब डॉलर, फ्रांस से 2.30 अरब डॉलर और कनाडा से 35 करोड़ डॉलर का निवेश होने की उम्मीद है। वहीं, यूएई कच्चे तेल और ऊर्जा क्षेत्र में भारत का एक महत्वपूर्ण साझेदार है। यूएई की अर्थव्यवस्था 800 अरब डॉलर की है और मौजूदा समय में भारत में उसका निवेश सिर्फ तीन अरब डॉलर का है। निवेश के लिए उसे बाजार चाहिए जो भारत में है।

राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से देखें तो दोनों देश के बीच यह एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसमें प्रत्यर्पण, आपसी कानूनी सहयोग और तस्करी जैसे मुद्दे अहम हैं। वहीं, आईएसआईएस के खतरों को देखते हुए यूएई महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके साथ ही दोनों देश आतंकवाद निरोधी सहयोग के लिए समझौते कर सकते हैं। वहीं, आईएसआईएस की कैद में फंसे 39 भारतीयों की रिहाई के लिए भी कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं।

अब राजनीतिक मायने भी देख सकते हैं। अपने इस दौरे में वह दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिद कही जाने वाली अबु धाबी के शेख जायद मस्जिद भी जाएंगे। इस मस्जिद में करीब 40 हजार लोग एक साथ जा सकते हैं। मोदी वहां भारतीय कामगारों से मुलाकात भी करेंगे। ऐसे में यह दौरा प्रधानमंत्री की हिंदू नेता वाली छवि से ऊपर उठकर उन्हें सभी वर्गों का नेता बनने में मदद करेगा। वहीं, बिहार में होने वाले चुनाव में भी यह बीजेपी को मदद कर सकता है।

यूएई में रह रहे 26 लाख भारतीयों को भी नरेंद्र मोदी के आने का इंतजार होगा। हो भी क्यों न आखिर उनके घर से कोई वहां पहुंच रहा है। 

Sunday, 2 August 2015

ऑक्सीजन है ये दोस्ती, जिंदगी की बहुत बड़ी उपलब्धि है

फ्रैंडशिप डे, फाडर्स डे, मडर्स डे, ऐसे ही आजकल हर तारीख को कोई न कोई 'डे' होता है। मुझे ये 'डे' मनाना पसंद नहीं, लेकिन क्या करूं इनमें से कुछ के नाम ही ऐसे होते हैं कि न चाहते हुए भी इसकी खुशी में शामिल हो जाता हूं।

आज लोग फ्रेंडशिप डे मना रहे हैं। सोशल साइट्स पर यह ट्रेडिंग सब्जेक्ट है। दोस्ती को लेकर लोगों ने बड़े ही दिलचस्प ट्वीट किए हैं, जिन्हें पढ़ कर वह सुनहरे दिन याद आ गए जब लगता था कि बस दोस्तों का साथ हो तो हर कुछ मुमकिन है। 12 बजे रात से मिल रहे फ्रेंडशिप डे के मैसेज और कुछ दोस्तों द्वारा भेजी गई साथ की पुरानी फोटोज ने सबकुछ ताजा कर दिया। दोस्तों के साथ इमोशनल अटैचमेंट रहा है, जिसमें कोई स्वार्थ-चापलूसी का दूर दूर तक कोई मामला नहीं रहा। आज भी बनारस से जुड़ा हर काम फट से हो जाता है, जिसका मुझे घमंड भी रहता है।

जब कॉलेज के बाद बनारस से बाहर नौकरी करने की बात आई तो मेरे कुछ शुभचिंतकों ने कहा था कि बस 6 महीने बनारस से बाहर रहोगे तो सभी दोस्त, भैया और चाचा भूल जाएंगे। तुम्हें भी उनकी याद नहीं आएगी और नई जगह नए तरीके से जिंदगी जीने लगोगे। लेकिन, उनकी बातें 100 फीसदी गलत साबित हुईं। मैं आज भी बनारस जाता हूं तो मुझे चाचा-भइया कहने वालों से लगायत ऐसे लोग जिन्हें मैं दोस्त, भइया और चाचा कहता हूं मुझसे ऐसे मिलते हैं कि इसे व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।

एक छोटा सा उदाहरण है। सोमवार को मेरा वीकली ऑफ होता है, इसलिए हर सप्ताह सोमवार या रविवार की शाम तक मेरे कई दोस्त, भइया और शुभचिंतकों का कॉल-मैसेज यह पूछने के लिए आ जाता है कि मैं बनारस आ रहा हूं या नहीं। आज के समय में सब बिजी हैं, लेकिन वह टाइम निकाल कर मुझसे मिलते हैं। साथ में घंटों बैठने की कोशिश करते हैं। एक दूसरा उदाहरण भी देख लीजिए। एक बार मैं काशी विश्वनाथ ट्रेन से कैंट स्टेशन उतरा और स्टेशन से जैसे ही बाहर निकला तो आवाज आई- भैया महादेव। मैंने मुड़कर देखा तो मेरा एक दोस्त दिखा। वह ऑफिस जा रहा था। हम दोनों ने एक दूसरे का हालचाल लिया। इसी बीच उसने बोला, 'चला घर छोड़ देई। मैंने कहा कि भाई ऑफिस जा, हम ऑटो से चल जाइब। उसने तुरंत जवाब दिया कि कल सुबह तू फिर से निकल जइबा। संझा के फोन करब त तू कह देबा फला जगह फला आदमी के संगे हई। मुलाकात हो न पाई। ऑफिस में त रोज गाली सुनी ला आज तोहरे संगे में समय बिता कर सुनब त पुराना याद ताजा हो जाई। हां ओ समय पापा-मम्मी डांटत रहलन अब ऑफिस में थोड़ा सा सुने के पड़ी।'  

मेरे दोस्तों की संख्या भी इतनी है कि मैं उंगलियों पर नहीं गिन सकता और कभी गिनने की कोशिश भी नहीं की। दोस्तों का मेरी जिंदगी में बहुत सहयोग रहा है। हर सुख-दुख में साथ खड़े रहे हैं। हर तरह के दोस्त। हर तरह की शैतानी। कुछ भी नहीं बचा है। क्या अच्छा, क्या बुरा। समाज की नजर में शरीफ से शरीफ और बदमाश से बदमाश, सब मेरे अच्छे दोस्त रहे हैं। इतनी चीजें हैं कि किसी से कहने पर वह यह भी सोच सकता है कि फेंक रहा है। भौकाली बनारसी है। लेकिन, हकीकत क्या है मैं जानता हूं और मेरे दोस्त जानते हैं। कुछ चीजें तो एक ग्रुप के दोस्तों के साथ होने पर दूसरे ग्रुप के दोस्तों को बताने पर उन्हें भी आश्चर्य होता था। 

ऐसे ही एक दोस्त से गुस्सा होकर मैंने उसे ब्लॉक कर दिया, जिससे लगभग एक महीने हम दोनों की बात नहीं हो पाई। एक दिन मंदिर के बाहर वह मुझसे मिल गया। मैंने झूठ बोल दिया कि भाई फोन ही नहीं है और इस समय पैसा नहीं है कि नया खरीदूं। इसके बाद मैं देर रात घर पहुंचा तो मम्मी बताईं कि फला लड़का आया था, ये मोबाइल देकर गया है। बहुत देर तक तुम्हारा इंतजार किया, अभी-अभी गया है। ये कुछ किस्से हैं। 

मुझसे ज्यादा उम्र के भी भइया लोगों से मेरी बहुत अच्छी दोस्ती रही है। सब दिल, पद और व्यक्तित्व से बड़े आदमी। लोग उनसे परिचय बढ़ाने के लिए परेशान रहते हैं। मुझसे परिचय और मामूली बोलचाल से दोस्ती और फिर छोटा भाई तक का सफर इतना जल्दी बीत गया कि मैं खुद अंदाजा नहीं लगा सकता। वे अपने-अपने क्षेत्र में इतना काम किए हैं कि समाज भी उन्हें बड़ा आदमी मानता है। आज भी उनका केयर करना, मेरी हर चीजों में मुझे पॉजिटिव सुक्षाव देना। हम देर रात बातें करते हैं, किसी हम उम्र दोस्त या घरवालों की तरह। उनका मेरे करियर की चिंता करना, यह सब मेरी जिंदगी की एक बड़ी उपलब्धि है। 

बनारस से निकलने के बाद मैंने दोस्ती करना छोड़ दिया। भोपाल में मुझे एक दोस्त मिला। बाकी सब फार्मेलिटी वाले ही रहे। लखनऊ में मुझे एक बड़े भाई जैसे दोस्त मिले। व्यक्तित्व के अच्छे और नि:स्वार्थ संबंध रखने वाले। वह भी बनारस के उन्हीं भइया लोगों की तरह हैं जो मेरा फोन न उठाने और वॉट्सऐप का जवाब नहीं देने पर परेशान हो जाते हैं। सच बताऊं दो साल बाद अच्छी दोस्ती हुई।    

दोस्तों के साथ की ऐसी यादें हैं जिन्हें मैं कभी नहीं भूल सकता। कभी भी नहीं। इतनी यादें हैं कि सच में एक डायरी भर जाएगी। उनकी दोस्ती मेरी जिंदगी का एक हिस्सा बन गई है। व्यस्त नौकरी के बीच आज बहुत कम बातें होती हैं, फेसबुक पर लाइक, कमेंट वॉट्सऐप पर एक-दो चैट और जरूरत पड़ने पर फोन करने के अलावा ज्यादा बात नहीं होती है। लेकिन, आज भी दोस्तों का साथ वैसा ही है। उनसे बात करना ऑक्सीजन की तरह काम करता है। उनके साथ समय बिताना एक ख्वाहिश के पूरे होने जैसा लगता है।  दोस्तों ने मेरा इतना साथ दिया कि मैं उन्हें कभी धन्यवाद भी नहीं बोल सकता। धन्यवाद, आभार यह शब्द बौने हैं उनके सहयोग के आगे। 

Thursday, 30 July 2015

याकूब की फांसी और 12 वकीलों द्वारा तीन बजे रात में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

'आखिरकार...' 1993 मुंबई ब्लास्ट के दोषी याकूब मेमन को फांसी दे दी गई। इस 'आखिरकार' पर इतना जोर इसलिए देना पड़ रहा है क्योंकि उसे फांसी के फंदे तक पहुंचने से पहले लोगों ने जोर लगाकर उसका नाम लिया। कई दिनों तक यह नाम ट्विटर और फेसबुक पर ट्रेंड हुआ। बहुत लोग उसे फांसी देने के पक्ष में थे तो कुछ ने इसका विरोध भी किया। देश के इतिहास में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा पहली बार रात में खुला और याकूब की फांसी पर रोक लगाने की याचिका पर सुनवाई भोर में तकरीबन तीन बजे हुई। पक्ष और विपक्ष के लोग पूरी रात जागते रहे तो तटस्थ हमेशा की तरह अपने शिड्यूल में लगे रहे।

मुंबई में हुए 13 सिलसिलेवार बम विस्फोटों में 257 लोगों की जान गई थी, जबकि 700 से अधिक घायल हुए थे (यह सरकारी आंकड़ा है, इसकी विश्वसनीयता का अंदाजा आप खुद लगाइएगा)। क्या याकूब मेमन के जेल में काटे 21 साल उसके गुनाह के लिए काफी थे? 100 से ज्यादा स्कूली बच्चों की मौत की तुलना याकूब द्वारा अपने साथियों के खिलाफ दिए सबूत से करनी चाहिए? क्या याकूब के परिवार को देखते हुए उसके साथ मानवता दिखानी चाहिए? एक आतंकवादी को किसी धर्म से जोड़कर देखना चाहिए? या फिर यह कहते हुए उसकी फांसी पर रोक लगानी चाहिए कि‍ असीमानंद और साध्वी प्रज्ञा भी तो बम ब्लास्ट के आरोपी हैं उन्हें भी सजा मिलनी चाहिए? ये तर्क देना कि याकूब को गिरफ्तार नहीं किया गया था, उसे पाकिस्तान के खिलाफ सबूत जुटाने के लिए लाया गया था, उसे जीवनदान देने के लिए पर्याप्त था?
याकूब कोई अनपढ़ नहीं था, जो किसी झांसे में आकर वह इतनी आसानी से भारत चला आता। वह पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट था। वह अकाउंट से जुड़ी फर्म के साथ-साथ अपने आतंकवादी भाई टाइगर मेमन का गैरकानूनी फाइनेंस संभालता था। इतना ही नहीं वह जेल में रहते हुए भी इग्नू से पॉलिटिकल साइंस से पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहा था और अंग्रेजी से पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल कर चुका था। अब आप ही बताइए कि वह किसी की बातों में आ सकता था?
वकील आनंद ग्रोवर अब भी कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट से बड़ी भूल हुई है। यह सही फैसला नहीं है। याकूब की फांसी की सजा पर 14 दिन की रोक लगाने के लिए देर रात चीफ जस्टिस एच एल दत्तू के यहां आनंद ग्रोवर के अलावा प्रशांत भूषण, युग मोहित, नित्या रामाकृष्णा सहित 12 टॉप वकील की टीम भी पहुंची थी। तीन बजकर 20 मिनट पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई। अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने सरकार का पक्ष रखा। दोनों पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय बेंच ने याकूब की फांसी को बरकरार रखा। इसमें प्रफुल्ल चंद्र पंत और अमिताभ रॉय शामिल थे। करीब डेढ़ घंटे चली सुनवाई के बाद कोर्ट ने याकूब की फांसी को बरकरार रखते हुए वकीलों की याचिका खारिज कर दी। यह वकील किसे न्याय दिलाना चाह रहे थे यह समझ से परे है। हालांकि, उनका तर्क था कि वह भारतीय संविधान से मिली हर सुविधा याकूब को दिलाना चाहते थे, लेकिन क्या किसी गरीब-निरीह के लिए भी संविधान का ख्याल रखा जाता है?
कुछ ऑफिसर्स के स्टेटमेंट को लेकर भी लोग याकूब मेमन के पक्ष और विपक्ष में बयान दे रहे थे। आईबी के ऑफिसर रहे बी. रमण के अनुसार, याकूब को सरेंडर के लिए राजी किया गया था। वहीं, सीबीआई ने याकूब की गिरफ्तारी पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से दिखाई थी। एक और थ्योरी कहती है कि इंटरपोल ने उसे भारतीय एजेंसियों को सौंपा था और फिर उसे सरकारी प्लेन से नई दिल्ली लाया गया। इसमें गलत क्या है? इतने बड़े वारदात को अंजाम देने के लिए कई थ्योरी बनाई जा सकती है। हो सकता है अलग-अलग तरह से सभी को अप्लाई किया गया हो। यह देश के लिए एक कामयाबी थी।
ज्युडिशियरी में फांसी को कैपिटल पनि‍शमेंट कहते हैं क्योंकि किसी का जीवन खत्म होता है इसलिए जज पेन की निब तोड़ देते हैं। यहां तो पेन की निब भी बचानी चाहिए थी। इस बात से भी तरस नहीं आता कि जब याकूब फांसी के फंदे की ओर जाने लगा तो उसे उसका भाई सुलेमान नजर आया। उसने आवाज देकर कहा कि भाभी राहिना और जेल में ही पैदा हुई बच्ची जुबैदा का ख्याल रखना। ब्लास्ट में मरने वाले 200 से ज्यादा लोगों के बारे में क्यों नहीं ख्याल आया था? 100 से ज्यादा बच्चों का उसे मोह नहीं लगा था?
यहां याकूब के वकील का पक्ष देखिए
-याकूब को 14 दिन का समय मिलना चाहिए।
-याकूब के पास दया याचिका पर अपील का अधिकार।
-राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका खारिज करने की कॉपी नहीं मिली।
-2014 में दया याचिका याकूब के भाई ने दाखिल की थी, इस बार उसने दाखिल की है।
सरकारी पक्ष के वकील की दलील देखिए
-बार-बार याचिका से सिस्टम कैसे काम करेगा?
-इस तरह मौत के वारंट की कभी तामील नहीं हो सकेगी।
-राष्ट्रपति के पास करने को और भी काम हैं।
-दया याचिका खारिज चुनौती न देने की बात कही।
-याकूब की सहमति से दाखिल की गई थी दया याचिका।
रात 12 बजे चीफ जस्टिस के यहां पहुंचे वकील, चीफ जस्टिस ने क्रिएट की बेंच।

दोनों दलीलों को पढ़ने के बाद ब्लास्ट में मरने वालों के बारे में सोचिए। उन 200 से ज्यादा लोगों के परिवार के बारे में सोचिए।
फिर डिसाइड करिए कि एक आतंकवादी को क्या इससे कम सजा मिलनी चाहिए?

Tuesday, 28 July 2015

'कलाम को आखिरी सलाम', ऐसी हेडिंग जिसे चाहकर भी नहीं बदल सकता था

जब भी कोई स्टूडेंट मुफलिसी के बीच एक बड़ा सपना देखता है तो उसे मोटिवेट करते हैं डॉ. अब्दुल कलाम ('था' लगाने का मन नहीं हो रहा)। एक मछुआरे का बेटा आधे पेट खाकर और बेहद छोटी जगह से निकलकर सफलतम और सबसे ज्यादा प्यार पाने वाले भारतीयों में कैसे शुमार हो गया, इसे जानकर लाखों स्टूडेंट्स को अपनी जिंदगी बदलने का मौका मिला। लोग उन्हें मिसाइल मैन, भारत रत्न, देश के 11वें राष्ट्रपति, साइंटिस्ट (वैज्ञानिक) जैसे कई उपनामों से पुकारते हैं, लेकिन उन्हें 'शिक्षक' कलाम कहलाना ही पसंद था। पृथ्वी को जीने लायक कैसे बनाया जाए? इस बारे में बात करने शिलांग पहुंचे शिक्षक कलाम स्टूडेंट्स के बीच से ही अपनी अनंत यात्रा के लिए निकल गए।
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम सच्चे कर्मयोगी के उदाहरण थे। अखबार बेचकर घर की आर्थिक मदद करने वाले कलाम ने 'अग्नि' को उड़ान देकर देश को शक्तिशाली बनाया। उनके मेहनत का ही प्रतिफल था कि भारत परमाणु शक्ति संपन्न देश बन सका। भारत को बैलेस्टिक मिसाइल और लांचिंग टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भर बनाने वाले कलाम के सादे कपड़े, बालों को संवारने का तरीका और बच्चों-सी चहकती हंसी तमाम मिसाइलों से ज्यादा जानलेवा थी।
पृथ्वी, त्रिशूल, अग्नि-1, धनुष, आकाश, नाग, ब्रह्मोस समेत कई मिसाइलें बनाने वाले कलाम को लोग मिसाइलमैन कहते थे। इससे इतर एक तथ्‍य यह भी है कि‍ कलाम को भी कुछ फैसले लेने में दर्द होता था। उन्होंने कहा था कि राष्ट्रपति होते हुए सबसे मुश्किल काम सजा-ए-मौत पर फैसला लेना था। इसके बाद उन्होंने इसे समाप्त करने की वकालत की थी। मृत्युदंड पर लॉ कमीशन के कंसलटेशन पेपर पर जवाब देते हुए कलाम ने कहा था कि राष्ट्रपति के तौर पर उन्हें इस तरह के मामलों में फैसला लेने में दर्द महसूस हुआ, क्योंकि ऐसे ज्यादातर मामलों में सामाजिक और आर्थिक भेदभाव था।
कहा जाता है कि उन्हें पढ़ाई के प्रति इतना लगाव था कि वह रोज सुबह चार बजे उठ कर मैथ्स पढ़ते थे। पढ़ाई खत्‍म होने के बाद ही वे अपने पिता के साथ नमाज पढ़ते थे। पढ़ाई को किसी धर्म-संप्रदाय से बड़ा मानने वाले कलाम कहते थे, जब तक ब्रह्मांड में सोलर सिस्टम है हर एक सेकेंड शुभ है। एक साधारण बच्चे से लेकर कलाम बनने का सफर आसान नहीं था, लेकिन उनकी जिंदगी का तो फलसफा ही था कि बड़े सपने देखो।
गरीब परिवार में जन्म लेने के कारण उन्होंने घर-घर जाकर अखबार बेची, लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ी। वे रातभर लालटेन की रोशनी में पढ़ते थे। कलाम ने 1958 में अंतरिक्ष विज्ञान में मद्रास यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया। इसके बाद उन्होंने डिफेंस रिसर्च डेवलपमेंट लेबोरेट्री में भी काम किया। इसके बाद राष्ट्रपति तक का सफर और इस बीच 20 किताबों को लिखना। उन्होंने जो भी जिम्मेदारी ली, उसे नई परिभाषा दी।
प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में कलाम उनके वैज्ञानिक सलाहकार थे। उन्होंने कलाम को मंत्री बनने का ऑफर दिया था, लेकिन कलाम ने मना कर दिया। पोखरण में किए गए न्यूक्लियर टेस्ट में कलाम ने अहम भूमिका निभाई थी। बाद में एनडीए की सरकार ने उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया और इसके बाद व्यापक समर्थन मिलने के बाद वह देश के 11वें राष्ट्रपति बने। सर्वसुलभ होने के कारण उन्हें आम लोगों का राष्ट्रपति कहा गया।
शिलांग में आईआईएम के छात्रों को लेक्चर देने के दौरान उन्हें दिल का दौरा पड़ा और बेथनी अस्पताल में उनका निधन हो गया। मैं दो दिन से खबरों से दूर था और मंगलवार की सुबह ऑफिस पहुंचने पर जैसे ही मैंने bhaskar.com टाइप किया मुझे स्क्रीन पर विश्वास ही नहीं हुआ। ध्यान से देखा तो हेडिंग था 'Live: पालम एयरपोर्ट पहुंचा कलाम का पार्थिव शरीर।' दूसरी हेडिंग थी, 'कलाम को आखिरी सलाम देने एयरपोर्ट पहुंचे प्रधानमंत्री।' यह ऐसी हेडिंग है जिसे पढ़कर मेरे पास शब्द ही नहीं बचे और मजबूरी ऐसी थी कि इसे बदलने के लिए नया एंगल भी नहीं खोज सकता था।
कलाम को आखिरी सलाम।

इसे आप यहां भी पढ़ सकते हैं... http://www.bhaskar.com/news/UP-tribute-to-inspirational-man-apj-kalam-5066738-NOR.html

Tuesday, 21 July 2015

ओल्ड मॉन्क लवर्स... या बदलता यंगिस्तान

रम पीने वालों के लिए बुरी खबर है। खासतौर पर ओल्ड मॉन्क लवर्स के लिए। व्हिस्की के प्रिमियम ब्रांड जॉनी वॉकर, ब्लंडर्स प्राइड, इंपिरियल ब्लू और रॉयल स्टेज पीने वालों के लिए भी यहां खबर है। हां, 'आई एम नॉट अ पार्टी एनीमल। ही ऑर शी इनसिस्ट मी। आई ड्रिंक जस्ट टू हैव अ गुड टाइम। आई एम अ गुड गर्ल/ब्वॉय। डोन्ट माइंड स्टिरियोटाइप गार्जियन लैक्चर।' ऐसी बातें करने वाले यंगिस्तान के लिए अच्छी या बुरी खबर है वे खुद डिसाइड करें। यंग इंडिया किस रास्ते से आगे बढ़ रहा है, इसकी भी रिपोर्ट है। यहां पढ़िए...

इंडिया को आज कल यंगिस्तान कहते हैं। कहें भी क्यों न। एक रिपोर्ट के अनुसार, यहां प्रति पांच व्यक्ति में एक शख्स युवा है। वहीं, साल 2020 तक भारत दुनिया का सबसे युवा देश बन जाएगा, जहां नौजवानों की आबादी करीब 64 फीसदी हो जाएगी। अब एक दूसरी रिपोर्ट की बात करते हैं। मेट्रो शहरों में लगभग 45 फीसदी युवा महीने में 4-5 बार ड्रिंक करते हैं। वहीं, 19-26 साल के यूथ 60 फीसदी एल्कोहल कंज्यूम कर जाते हैं। पब और बार के 80 फीसदी कस्टमर की उम्र 25 साल के आस पास है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कुल जनसंख्या के मामले में हालांकि, भारत चीन से पीछे हैं, लेकिन 10 से 24 साल की उम्र के 35.6 करोड़ लोगों के साथ भारत सबसे अधिक युवा आबादी वाला देश है। अब एक तीसरी रिपोर्ट भी देखिए। अपने जीवन के 60 बसंत देख चुका रमों का राजा 'ओल्ड मॉन्क' बुरे दौर से गुजर रहा है। इसकी बिक्री लगभग आधी हो गई है। इसे चाहने वाले सोशल साइट्स पर इसे बचाने के लिए कैंपेन चला रहे हैं और इसे बचाने की कोशिश में इसे ज्यादा कंज्यूम करने की अपील कर रहे हैं। 

ये यंग इंडिया है, जो आधुनिकता की रेस में उसेन बोल्ट की तरह है। लेकिन, विडंबना है कि वे खाता कम और दौड़ता ज्यादा है। वह अल्कोहल का भी डाई हार्ट लवर्स हो सकता है। खुद को पाक-साफ बताते यह दूसरों के इनसिस्ट करने पर एल्कोहल पीने की बात करते हैं, लेकिन कुछ ही पल बाद कहते हैं कि थोड़ी सी ही तो पी है, कौन सा जुर्म कर दिया। आई एम अ गुड गर्ल ऑर ब्वॉय। ये यंगिस्तान बॉटल के बारे में बेहिचक बात करता है। पैग के बारे में दोस्तों से पूछता है। किसी का बर्थ डे हो या कोई मैच, एग्जाम की शुरुआत हो या अंत, बोरियत मिटानी हो या उदासी को दूर करना हो, कितनी भी बड़ी परेशानी हो या खुशी, ये पीते हैं और छक कर पीते हैं। वे कहते हैं, वी आर एंजाइंग अवर लाइफ इन डैट टाइप। लीव फ्री एंड थिंक बिग। डोंट माइंड स्टिरियोटाइप गार्जियन लैक्चर। लेकिन, जहां बात होती है डू बेस्ट की वहां वह घनचक्कर में पड़ जाते हैं।  

अब आते हैं 60 साल के रमों के राजा ओल्ड मॉन्क पर। इंडियन आर्मी से आम आदमी तक की दूरी तय करने में इसे काफी साल लग गए। फिर, जब पहुंचा तो छा गया। मीडिल इनकम और फैमिली वालों की यह पहली पसंद है। देखते ही देखते लोग इसके डाई हार्ट लवर्स हो गए। लेकिन, आज कल ओल्ड मॉन्क के बुरे दिन हैं।  साल 2005 में इसकी जितनी सेलिंग थी उसकी आधी हो गई है। 

अब आप ये सोचते होंगे की ओल्ड मॉन्क के फैन कम होते जा रहे हैं और इसके चाहने वाले किसी दूसरी ब्रांड की तरफ जा रहे हैं। लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। लोगों ने रम पीना ही कम कर दिया है। यूरो मॉनिटर के हिसाब से भारत में जहां वाइन का कंजप्शन 6 फीसदी और बियर का 8 फीसदी बढ़ा है, वहीं रम का मार्केट 1.5 फीसदी घटा है। व्हिस्की के प्रीमियम ब्रांड जॉनी वॉकर, ब्लंडर्स प्राइड, इंपिरियल ब्लू और रॉयल स्टेज लोगों को ज्यादा अट्रैक्ट कर रहा है। इसके कारण ही ओल्ड मॉन्क घाटे में चल रहा है। 

अब आते हैं ओल्ड मन्क के फैन्स की तरफ। मेरे एक सीनियर हैं, वह भी इसके जबरदस्त फैन हैं। उन्हें जब पता चला कि ओल्ड मॉन्क घाटे में चल रहा है और कुछ ऐसा ही बाजार रहा तो जल्द ही बंद जाएगा तो उन्होंने बकायदा दो पेटी का ऑर्डर कर दिया। इसके साथ ही इसे सेव करने के कैंपेन में अपनी हिस्सेदारी करते हुए कमेंट किया कि 'वी कंज्यूम मोर फॉर लॉन्ग लाइफ ऑफ अवर बेस्ट टेस्ट रम। सीनियर के मुताबिक उन्हें सबसे पहले ओल्ड मॉन्क उनके पापा ने पिलाया था, ये कहते हुए कि 'मर्दों वाली ड्रिंक पिया करो।' इसके बाद वह इसके फैन हो गए। नवाबों के शहर लखनऊ में मोहन मिकिंस इसे बनाता था और लोग यहां से लगेज कम और ओल्ड मॉन्क ज्यादा ले जाते थे।

सोशल साइट्स पर इसके लिए चल रहे कैंपेन में लोगों के स्टेट्मेंट पढ़ कर और मजा आया। चूंकि मैं इसका फैन नहीं हूं इसलिए उस पेज का लिंक नहीं डाल रहा हूं, लेकिन यकीन मानिए ओल्ड मॉन्क लवर्स ने अपने कमेंट में दिल के जज्बात उतार रखे हैं। मैं यह सोच रहा हूं कि क्या किसी खाने-पीने जैसी चीज से मैं इतनी मोहब्बत कर पाऊंगा। सच में ये प्यार है जो किसी से भी हो सकता है। अब वह ओल्ड मॉन्क ही क्यों न हो। 

Sunday, 19 July 2015

किसानों के आइकन बने हैं अमिताभ बच्चन, फिल्म की स्क्रिप्ट बन कर न रह जाए ये?

जरा सोचिए! भारतीय क्रिकेट टीम का कप्तान विश्वनाथन आनंद को बना दिया जाए। किसी गैंगेस्टर को शांति का नोबल पुरस्कार दे दिया जाए। एक भी फिल्म नहीं देखना वाला सत्यजित रॉय पर किताब लिख दे। किसी राजनेता को बॉलीवुड का ब्रांड एंबेस्डर बना दिया जाए। ...तो आपको कैसा लगेगा? इसे छोड़िए। अब ये सोचिए कि अमिताभ बच्चन का नाम आते ही आपकी आंखों के सामने उनकी कौन सी तस्वीर बनती है। हीरो वाली ही न! अब जरा किसान अमिताभ बच्चन के बारे में सोचिए। 'सूर्यवंशम' फिल्म के सीन्स दिमाग में आएं क्या?

भारत सरकार ने हाल ही में डीडी किसान चैनल लॉन्च किया है। बताया जा रहा है कि यह चैनल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना था। अब चैनल की रीच बढ़ाने के लिए उसकी मार्केटिंग और ब्रांडिग करनी ही पड़ेगी। इसके लिए एक ऑइकन लीडर की भी जरूरत पड़ेगी जो इसे लीड करे। ऐसे में आपको किसका नाम सूझेगा या आप किसे देखन चाहेंगे। जरा सोचिए! अमेरिका के प्रमुख निवेश सलाहकार और लोकप्रिय लेखक जिम रोजर्स या पंजाबी कृषि विशेषज्ञ प्रोफेसर एसएस गिल या फिर ह्रासमान प्रतिफल नियम (Law of Diminishing Returns) मांग का नियम, पूर्ति का नियम बताने वाले विशेषज्ञ को। डीडी किसान चैनल की रीच बढ़ाने के लिए भारत सरकार को सबसे बड़ा नाम सुझा है अमिताभ बच्चन का। इसके लिए उन्हें 6.31 करोड़ रुपए भी दिए गए हैं। 

अब एक्टर अमिताभ बच्चन से बाहर निकलकर किसान अमिताभ के बारे में सोचिए। है न थोड़ा आश्चर्य करने वाली चीज। वैसे किसान चैनल का ब्रांड एंबेस्डर होने से बिगी बी किसान नहीं बने हैं, वह कागजीतौर पर भी किसान हैं। उनके पास लखनऊ के काकोरी के मुजफ्फरनगर चौधरी खेड़ा में करीब 33 बीघा जमीन है। इसकी कीमत करीब 67 लाख रुपए प्रति बीघा बताई गई है। इसे उनके जीजा की देखरेख में शाहजहांपुर का एक परिवार संभालता है। आपको यह जानकर भी आश्चर्य होगा कि इस साल ओलावृष्टि और बारिश से जब किसानों की 70 फीसदी फसल बर्बाद हो गए तो भी बिग बी के खेतों के फसल 95 फीसदी तक सुरक्षित काट लिए गए थे। हैं न वह अच्छे किसान!

जब बुंदेलखंड में किसान सुसाइड कर रहा था, जब महाराष्ट्र के किसान मुआवजे की मांग को लेकर धरना दे रहे थे और दिल्ली में किसान गजेंद्र, केजरीवाल की सभा में सुसाइड कर रहे थे, उसी बीच बिग बी के खतों की फसलें भी चर्चा में थी। हालांकि, बिग बी ने खुद जाकर खेती नहीं की थी, बल्कि एक किसान परिवार को खेती के लिए लगाया था और उसे खेती के लिए आवश्यक सभी जरूरी चीजें समय पर उपलब्ध कराई गई थीं। वहां पूरी तरह से वैज्ञानिक पद्धति को फॉलो किया जाता है, जिसके लिए जमकर पैसा भी खर्च किया जाता है। फिर खेती बेहतर क्यों न हो? 

उचित संसाधन और अच्छी कृषि पद्धति से तो फसलों की अच्छी पैदावर की जा सकती है, लेकिन इसके लिए पैसों की भी जरूरत होती है। अब ऐसे किसान जो एक सीजन की खेती से निराशा मिलने पर सुसाइड कर ले रहे हैं वह बिग भी की तरह कैसे इन्वेस्ट कर पाएंगे। रोल मॉडल ऐसा होना चाहिए जो अपने बीच का हो। जिसे देख कर वह इंस्पायर हों कि यह हमारे बीच से ही निकल कर बेहतरीन काम किया है और बुलंदियों को छुआ है। आइकन किसी को थोपा नहीं जा सकता है। बेहतर होता किसी किसान को रोल मॉडल बनाया जाता, एक प्रधान सेवक के तौर पर। जिससे सच में लगता कि भारत कृषि प्रधान देश है और आने वाले समय में यहां की अर्थव्यवस्था कृषि ही मजबूत करेगी। 

खैर यह तो भविष्य ही बताएगा कि किसानों के आइकन बने अमिताभ बच्चन से कुछ फायदा भी होगा या किसी फिल्म की स्क्रिप्ट ही बनकर रह जाएगा...